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श्लोक 2.21.54  |
कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नार्हणां वयम्।
प्रतिगृह्णीम तद् विद्धि एतन्न: शाश्वतं व्रतम्॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| हम अपने कार्य से आपके घर आये हैं; अतः शत्रु से पूजा स्वीकार नहीं कर सकते। यह बात आप भली-भाँति समझ लीजिए। यह हमारा सनातन व्रत है ॥54॥ |
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| We have come to your house for our work; hence we cannot accept worship from the enemy. You must understand this well. This is our eternal vow. ॥ 54॥ |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि कृष्णजरासंधसंवादे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें श्रीकृष्णजरासंधसंवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं) |
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