हम अपने कार्य से आपके घर आये हैं; अतः शत्रु से पूजा स्वीकार नहीं कर सकते। यह बात आप भली-भाँति समझ लीजिए। यह हमारा सनातन व्रत है ॥54॥
We have come to your house for our work; hence we cannot accept worship from the enemy. You must understand this well. This is our eternal vow. ॥ 54॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि कृष्णजरासंधसंवादे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें श्रीकृष्णजरासंधसंवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)