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mahabharat 2.21.53: धैर्यवान पुरुष शत्रु के घर में बिना द्वार के प्रवेश करते हैं और मित्र के घर में द्वार सहित प्रवेश करते हैं। ये ही द्वार मित्रों और शत्रुओं के लिए निर्धारित हैं ॥53॥   |   mahabharat अध्याय 2.21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.21.53 
अद्वारेण रिपोर्गेहं द्वारेण सुहृदो गृहान्।
प्रविशन्ति नरा धीरा द्वाराण्येतानि धर्मत:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
धैर्यवान पुरुष शत्रु के घर में बिना द्वार के प्रवेश करते हैं और मित्र के घर में द्वार सहित प्रवेश करते हैं। ये ही द्वार मित्रों और शत्रुओं के लिए निर्धारित हैं ॥53॥
 
Patient men enter the house of their enemy without a door and enter the house of their friend with a door. These are the doors prescribed for friends and enemies. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)