श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.21.51 
पुष्पवत्सु ध्रुवा श्रीश्च पुष्पवन्तस्ततो वयम्।
क्षत्रियो बाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान्।
अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद् बार्हद्रथेरितम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव पुष्प धारण करने वालों में लक्ष्मी का निवास है, इसीलिए हम पुष्पों की मालाएँ धारण करते हैं। क्षत्रिय का बल और पराक्रम उसकी भुजाओं में होता है, बोलने में वह उतना वीर नहीं होता। हे बृहद्रथपुत्र! इसीलिए क्षत्रिय के वचन निर्लज्ज (विनम्रता से युक्त) कहे गए हैं॥ 51॥
 
Dhruva is the abode of Goddess Lakshmi in those who wear flowers, that is why we wear garlands of flowers. The strength and valour of a Kshatriya is in his arms, he is not that brave in speaking. O son of Brihadratha! That is why the words of a Kshatriya are said to be without impudence (full of humility). ॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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