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mahabharat 2.21.47: 'तुम सब लोग यहाँ उपस्थित होकर मेरी विधिपूर्वक की गई इस पूजा को क्यों स्वीकार नहीं करते? फिर मेरे यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?'॥47॥   |   mahabharat अध्याय 2.21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.21.47 
एवं च मामुपास्थाय कस्माच्च विधिनार्हणाम्।
प्रतीतां नानुगृह्णीत कार्यं किं वास्मदागमे॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'तुम सब लोग यहाँ उपस्थित होकर मेरी विधिपूर्वक की गई इस पूजा को क्यों स्वीकार नहीं करते? फिर मेरे यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?'॥47॥
 
'Why don't you all accept this worship that I have duly offered to you, being present here? Then what is the purpose of my coming here?'॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)