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श्लोक 2.21.47  |
एवं च मामुपास्थाय कस्माच्च विधिनार्हणाम्।
प्रतीतां नानुगृह्णीत कार्यं किं वास्मदागमे॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| 'तुम सब लोग यहाँ उपस्थित होकर मेरी विधिपूर्वक की गई इस पूजा को क्यों स्वीकार नहीं करते? फिर मेरे यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?'॥47॥ |
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| 'Why don't you all accept this worship that I have duly offered to you, being present here? Then what is the purpose of my coming here?'॥ 47॥ |
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