श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.21.45 
चैत्यकस्य गिरे: शृङ्गं भित्त्वा किमिह छद्मना।
अद्वारेण प्रविष्टा: स्थ निर्भया राजकिल्बिषात्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
'क्या कारण है कि तुम चैत्यक पर्वत की चोटी तोड़कर राजा के विरुद्ध अपराध करके भी बिना किसी द्वार के, वेश धारण करके नगर में प्रवेश कर गए हो और उनसे भयभीत नहीं हो?॥ 45॥
 
'What is the reason that you have entered the city without any gate, wearing disguises, even after breaking the peak of the Chaityaka mountain and committing a crime against the king and not being afraid of him?॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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