श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.21.4 
पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्भिर्मनोहरै:।
निगूढा इव लोध्राणां वनै: कामिजनप्रियै:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वहाँ लोध नामक वृक्षों के अनेक सुन्दर वन हैं, जो उन पाँचों पर्वतों को आच्छादित करते प्रतीत होते हैं। उनकी शाखाओं के शीर्ष पर पुष्प दिखाई देते हैं। लोध के ये सुगन्धित वन कामातुर मनुष्यों को अत्यंत प्रिय हैं॥4॥
 
There are many beautiful forests of trees called Lodh, which seem to cover those five mountains. Flowers are seen on the top of their branches. These fragrant forests of Lodh are very dear to the lustful people.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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