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mahabharat 2.21.31: वह जल, मधुपर्क और गौओं का दान करने योग्य था। उसका सर्वत्र स्वागत हुआ। उसे आते देख जरासंध ने खड़े होकर आदरपूर्वक उसका स्वागत किया॥31॥   |   mahabharat अध्याय 2.21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.21.31 
तान् पाद्यमधुपर्कार्हान् गवार्हान् सत्कृतिं गतान्।
प्रत्युत्थाय जरासंध उपतस्थे यथाविधि॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वह जल, मधुपर्क और गौओं का दान करने योग्य था। उसका सर्वत्र स्वागत हुआ। उसे आते देख जरासंध ने खड़े होकर आदरपूर्वक उसका स्वागत किया॥31॥
 
He was worthy of receiving water, madhuparka and cows as offerings. He was welcomed everywhere. Seeing him coming, Jarasandha stood up and welcomed him with due respect.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)