श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.21.30 
ते त्वतीत्य जनाकीर्णा: कक्षास्तिस्रो नरर्षभा:।
अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथा:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वह महान् लोगों से भरे हुए तीन द्वारों को पार करके बड़े गर्व, निर्भय और निश्चिंत भाव से राजा जरासंध के पास गया ॥30॥
 
After crossing three gates full of great people, he went near King Jarasandha with great pride, fearless and carefree. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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