vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद
»
श्लोक 30
श्लोक
2.21.30
ते त्वतीत्य जनाकीर्णा: कक्षास्तिस्रो नरर्षभा:।
अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथा:॥ ३०॥
अनुवाद
वह महान् लोगों से भरे हुए तीन द्वारों को पार करके बड़े गर्व, निर्भय और निश्चिंत भाव से राजा जरासंध के पास गया ॥30॥
After crossing three gates full of great people, he went near King Jarasandha with great pride, fearless and carefree. 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×