श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.21.23 
पर्यग्न्यकुर्वंश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिता:।
ततस्तच्छान्तये राजा जरासंध: प्रतापवान्।
दीक्षितो नियमस्थोऽसावुपवासपरोऽभवत्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
पुरोहितों ने राजा को हाथी पर बिठाकर उसके चारों ओर जलती हुई अग्नि की परिक्रमा कराई। महाबली राजा जरासंध ने अनिष्ट निवारणार्थ व्रत की दीक्षा ली और विधिपूर्वक व्रत का पालन किया॥ 23॥
 
The priests made the king sit on an elephant and circled the burning fire around him. The mighty king Jarasandha took initiation into the vows to ward off evil and observed the fast following the rules.॥ 23॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas