श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  2.21.2-3 
वैहारो विपुल: शैलो वराहो वृषभस्तथा।
तथा ऋषिगिरिस्तात शुभाश्चैत्यकपञ्चमा:॥ २॥
एते पञ्च महाशृङ्गा: पर्वता: शीतलद्रुमा:।
रक्षन्तीवाभिसंहत्य संहताङ्गा गिरिव्रजम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! यहाँ विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मतंग) और पाँचवाँ चैत्यक नामक पर्वत हैं, जो मनोरंजन के काम आते हैं। बड़े-बड़े शिखरों वाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छाया देने वाले वृक्षों से सुशोभित हैं और एक-दूसरे के शरीर को इस प्रकार स्पर्श करते हैं मानो वे गिरिव्रज नगर की रक्षा कर रहे हों॥ 2-3॥
 
O dear! Here are the mountains named Vipul, Varaha, Vrishabha (Rishabha), Rishigiri (Matang) and the fifth Chaityak, which are useful for recreation. These five beautiful mountains with big peaks are decorated with trees giving cool shade and together they touch each other's bodies as if they are protecting the city of Girivraj.॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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