श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  2.21.18-19 
भङ्‍‍क्तवा भेरीत्रयं तेऽपि चैत्यप्राकारमाद्रवन्।
द्वारतोऽभिमुखा: सर्वे ययुर्नानाऽऽयुधास्तदा॥ १८॥
मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं तं समाद्रवन्।
शिरसीव समाघ्नन्तो जरासंधं जिघांसव:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इन तीनों वीरों ने उपर्युक्त तीनों नगाड़ों को तोड़कर चैत्यक पर्वत की प्राचीर पर आक्रमण किया। वे सभी नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करके द्वार के सामने मगधवासियों के परमप्रिय चैत्यक पर्वत पर आक्रमण कर रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे जरासंध को मार डालने के इरादे से उसके सिर पर प्रहार कर रहे हों। ॥18-19॥
 
These three heroes broke the above mentioned three drums and attacked the ramparts of the Chaityak mountain. All of them, carrying various kinds of weapons, attacked the Chaityak mountain, which is most loved by the people of Magadha, in front of the gate. It was as if they were striking Jarasandha's head with the intention of killing him. ॥18-19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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