श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.21.17 
स्वपुरे स्थापयामास तेन चानह्य चर्मणा।
यत्र ता: प्राणदन् भेर्यो दिव्यपुष्पावचूर्णिता:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
राजा ने उन नगाड़ों को उस राक्षस की खाल से ढककर अपने नगर में रख दिया। जहाँ भी वे नगाड़े बजते, वहाँ दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगती॥17॥
 
The king covered those drums with the skin of that demon and placed them in his city. Wherever those drums were played, there would be a shower of divine flowers.॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas