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श्लोक 2.21.14-15  |
स्फीतोत्सवमनाधृष्यमासेदुश्च गिरिव्रजम्।
ततो द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छ्रितम्॥ १४॥
बार्हद्रथै: पूज्यमानं तथा नगरवासिभि:।
मगधानां सुरुचिरं चैत्यकान्तं समाद्रवन्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ अधिकाधिक उत्सव हो रहे थे। कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता था। इस प्रकार तीनों गिरिव्रज के निकट पहुँचे। मुख्य द्वार पर जाने के बजाय, वे नगर में स्थित चैत्यक नामक ऊँचे पर्वत पर चले गए। उस नगर में रहने वाले लोग और बृहद्रथ के कुल के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे। मगध देश के लोग इस चैत्यक पर्वत से बहुत प्रेम करते थे। 14-15। |
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| There were more and more festivals happening there. No one could defeat it. Thus the three reached near Girivraj. Instead of going to the main gate, they went to the high mountain called Chaityak in the city. The people living in that city and the people of Brihadratha's family used to worship that mountain. The people of Magadh country loved this Chaityak mountain very much. 14-15. |
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