श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 20: युधिष्ठिरके अनुमोदन करनेपर श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनकी मगध-यात्रा  »  श्लोक 12-14
 
 
श्लोक  2.20.12-14 
क्षिप्रमेव यथा त्वेतत् कार्यं समुपपद्यते।
अप्रमत्तो जगन्नाथ तथा कुरु नरोत्तम॥ १२॥
त्रिभिर्भवद्भिर्हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे।
धर्मकामार्थरहितो रोगार्त इव दु:खित:॥ १३॥
न शौरिणा विना पार्थो न शौरि: पाण्डवं विना।
नाजेयोऽस्त्यनयोर्लोके कृष्णयोरिति मे मति:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ! पुरुषोत्तम! आप सावधान होकर ऐसा ही करें, जिससे यह कार्य शीघ्र पूरा हो जाए। जैसे धर्म, काम और अर्थ से रहित रोगी मनुष्य अत्यन्त दुःखी होकर अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है, वैसे ही मैं भी आप तीनों के बिना नहीं रह सकता। अर्जुन श्रीकृष्ण के बिना नहीं रह सकते और पाण्डुपुत्र अर्जुन के बिना नहीं रह सकते। इन दोनों कृष्ण नामधारी वीरों के लिए संसार में कोई भी अजेय नहीं है; ऐसा मेरा विश्वास है॥12-14॥
 
Jagannath! Purushottam! Be careful and do the same, so that this work gets completed soon. Just as a sick man devoid of Dharma, Kama and Artha becomes very sad and loses his life, similarly I too cannot live without you three. Arjuna cannot live without Shri Krishna and Panduputra cannot live without Arjuna. For these two heroes named Krishna, no one in the world is invincible; this is my belief.॥ 12-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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