श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 18: जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना  » 
 
 
अध्याय 18: जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना
 
श्लोक 1:  राक्षसी बोली- राजन! आपका कल्याण हो। मेरा नाम जरा है। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने वाली राक्षसी हूँ और आपके घर में पूजित होकर सुखपूर्वक रह रही हूँ॥1॥
 
श्लोक 2:  मैं मनुष्यों के प्रत्येक घर में सदैव विद्यमान रहती हूँ। मैं नाम से राक्षसी हूँ; परन्तु पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझे गृहदेवी के नाम से उत्पन्न किया था॥ 2॥
 
श्लोक 3-4:  और उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश के लिए नियुक्त किया है। मेरा स्वरूप दिव्य है। जो कोई मुझे अनेक पुत्रों वाली युवती के रूप में भक्तिपूर्वक अपने घर की दीवार पर अंकित करता है (मेरा चित्र बनाता है), उसका घर सदैव समृद्ध रहता है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है। प्रभु! मैं आपके घर में रहकर सदैव पूजित रही हूँ।॥3-4॥
 
श्लोक 5:  और तुम्हारे घर की दीवारों पर मेरा एक चित्र बना हुआ है, जिसमें मैं अनेक पुत्रों से घिरी हुई खड़ी हूँ। उस चित्र के रूप में गंध, पुष्प, धूप और भक्ष्य पदार्थों से मेरी पूजा की गई है॥5॥
 
श्लोक 6-7:  अतः उस पूजा के बदले में मैं सदैव आपका कुछ उपकार करने का विचार करता रहता था। हे पुण्यात्मा! मैंने आपके पुत्र के शरीर के ये दो टुकड़े देखे और उन्हें जोड़ दिया। महाराज! ईश्वर की कृपा से इन टुकड़ों के जुड़ने से यह राजकुमार प्रकट हुआ है। मैं तो इसमें केवल एक माध्यम मात्र हूँ। 6-7।
 
श्लोक d1:  महाराज! अब इस बालक का विधिपूर्वक पूजन कीजिए। यह इस संसार में मेरे नाम से विख्यात होगा।
 
श्लोक 8:  मुझमें सुमेरु पर्वत को भी निगलने की शक्ति है; फिर तुम्हारे इस बालक को खाने में क्या बड़ी बात है? परन्तु तुम्हारे घर में जिस प्रकार मेरी पूजा हुई है, उससे मैं संतुष्ट हूँ और मैंने यह बालक तुम्हें समर्पित किया है॥8॥
 
श्लोक 9:  भगवान श्रीकृष्ण बोले - हे राजन! ऐसा कहकर राक्षसी जरा वहाँ से अन्तर्धान हो गई और राजा उस बालक को अपने साथ अपने महल में ले गए।
 
श्लोक 10:  उस समय राजा ने बालक के जन्म-संस्कार आदि सभी आवश्यक संस्कार संपन्न किए और आदेश दिया कि मगध में जरा राक्षसी (गृह देवी) के पूजन हेतु एक भव्य उत्सव मनाया जाए॥10॥
 
श्लोक 11:  बालक का नामकरण करते समय ब्रह्मा के समान शक्तिशाली राजा बृहद्रथ ने कहा, 'यह जरासंध से संयुक्त हो गया है, इसलिए इसका नाम जरासंध होगा।'
 
श्लोक 12:  मगधराज का वह परम तेजस्वी पुत्र अपने माता-पिता को सुख पहुँचाता हुआ, आकार और बल में बढ़ता गया और घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि और शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)