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mahabharat 2.17.d9-d10h: ‘वह अतिथि-प्रेमी होगा, दीन-दुखियों पर दया करेगा, महान बलवान होगा, संसार में उसकी चिरस्थायी कीर्ति फैलेगी और अपनी प्रजा का उस पर सदैव स्नेह बना रहेगा।’ इस प्रकार ऋषि चण्डकौशिक ने उसे ये आठ वरदान दिये।   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक d9-d10h
 
 
श्लोक  2.17.d9-d10h 
प्रियातिथेयतां चैव दीनानामन्ववेक्षणम्।
तथा बलं च सुमहल्लोके कीर्तिं च शाश्वतीम्॥
अनुरागं प्रजानां च ददौ तस्मै स कौशिक:।)
 
 
अनुवाद
‘वह अतिथि-प्रेमी होगा, दीन-दुखियों पर दया करेगा, महान बलवान होगा, संसार में उसकी चिरस्थायी कीर्ति फैलेगी और अपनी प्रजा का उस पर सदैव स्नेह बना रहेगा।’ इस प्रकार ऋषि चण्डकौशिक ने उसे ये आठ वरदान दिये।
 
'He will be a lover of guests, he will always have compassion on the poor and the needy, he will have great strength, his everlasting fame will spread in the world and he will always have the affection of his subjects.' Thus, sage Chandakaushik granted him these eight boons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)