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mahabharat 2.17.d8: 'खुपाल! मैं तुम्हारे पुत्र को आठ वरदान देता हूँ - वह ब्राह्मणों का भक्त होगा, युद्ध में अजेय होगा, युद्ध में उसकी रुचि कभी कम नहीं होगी।'   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक d8
 
 
श्लोक  2.17.d8 
अष्टौ वरान् प्रयच्छामि तव पुत्रस्य पार्थिव।
ब्रह्मण्यतामजेयत्वं युद्धेषु च तथा रतिम्॥
 
 
अनुवाद
'खुपाल! मैं तुम्हारे पुत्र को आठ वरदान देता हूँ - वह ब्राह्मणों का भक्त होगा, युद्ध में अजेय होगा, युद्ध में उसकी रुचि कभी कम नहीं होगी।'
 
'Khupal! I give eight boons to your son - he will be a devotee of Brahmins, will be invincible in war, his interest in war will never wane.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)