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श्लोक 2.17.d4  |
तादृशस्य हि राज्येन वृद्धत्वे किं प्रयोजनम्।
सोऽहं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने॥ |
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| अनुवाद |
| 'इस वृद्धावस्था में निःसंतान होने के कारण मुझे राज्य से क्या प्रयोजन? अतः अब मैं अपनी दोनों पत्नियों के साथ तपोवन में रहकर तपस्या करूँगा।' |
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| 'What use do I have of the kingdom in this old age, being childless? Therefore, now I will live in Tapovan with both my wives and perform penance. |
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