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mahabharat 2.17.d3: तब राजा ने ऋषि से कहा- 'भगवन्! मेरा कोई पुत्र नहीं है। महामुनि! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्य का जन्म लेना व्यर्थ है।'   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक d3
 
 
श्लोक  2.17.d3 
स उवाच मुनिं राजा भगवन् नास्ति मे सुत:।
अपुत्रस्य वृथा जन्म इत्याहुर्मुनिसत्तम॥
 
 
अनुवाद
तब राजा ने ऋषि से कहा- 'भगवन्! मेरा कोई पुत्र नहीं है। महामुनि! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्य का जन्म लेना व्यर्थ है।'
 
Then the king said to the sage- 'Lord! I have no son. Great sage! People say that the birth of a sonless man is futile.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)