| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना » श्लोक 6 |
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| | | | श्लोक 2.17.6  | ते वयं नयमास्थाय शत्रुदेहसमीपगा:।
कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्येव नदीरया:।
पररन्ध्रे पराक्रान्ता: स्वरन्ध्रावरणे स्थिता:॥ ६॥ | | | | | | अनुवाद | | जब हम नीति का आश्रय लेकर शत्रु के शरीर के निकट पहुँचेंगे, तो जैसे नदी का वेग किनारे के वृक्षों को नष्ट कर देता है, वैसे ही हम भी शत्रु का नाश क्यों न करें? अपनी दुर्बलताओं को छिपाकर हम शत्रु की दुर्बलता को ढूँढ़ेंगे और अवसर पाते ही उस पर बलपूर्वक आक्रमण करेंगे॥6॥ | | | | When we, by taking recourse to ethics, reach close to the enemy's body, then just as the force of a river destroys the trees on the bank, why should we not destroy the enemy in the same way? Keeping our weaknesses hidden, we will look for the enemy's weakness and as soon as we get the opportunity, we will attack him forcefully.॥ 6॥ | | ✨ ai-generated | | |
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