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श्लोक 2.17.52  |
राजोवाच
का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी।
कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| राजा बोले, "हे कल्याणी! कमल के भीतर के भाग के समान सुन्दर कान्ति वाली! तुम कौन हो जो मुझे पुत्र प्रदान करोगी? मुझे बताओ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम कोई देवी हो जो अपनी इच्छानुसार चलती हो।" 52. |
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| The king said, "O Kalyani, who has a beautiful lustre like the inner part of a lotus! Who are you who will give me a son? Tell me. It seems to me that you are some goddess who moves according to her will." 52. |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ सप्तदशोऽध्याय:॥ १७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६१ १/२ श्लोक हैं) |
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