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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.17.50 
श्रीकृष्ण उवाच
ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे।
तं बालमभिपद्याशु प्रस्रवैरभ्यषिञ्चताम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण कहते हैं - हे भरत रत्न! तब काशीराज की दोनों शुभ कन्याओं ने तुरन्त ही उस बालक को गोद में ले लिया और अपने स्तनों से उसका पालन-पोषण किया।
 
Sri Krishna says - O jewel of the Bharata clan! Then the two auspicious daughters of the King of Kashi immediately took the child in their lap and nourished him with their breast milk. 50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)