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mahabharat 2.17.4: नीति और परामर्श से किया गया कोई भी कार्य भाग्य के प्रतिकूल प्रभाव के बिना पूर्णतः सफल होता है। दोनों पक्षों का भेद शत्रु से सामना होने पर ही ज्ञात होता है। दोनों पक्षों का सभी मामलों में समान होना संभव नहीं है।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.17.4 
सुनयस्यानपायस्य संयोगे परम: क्रम:।
संगत्या जायतेऽसाम्यं साम्यं च न भवेद् द्वयो:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नीति और परामर्श से किया गया कोई भी कार्य भाग्य के प्रतिकूल प्रभाव के बिना पूर्णतः सफल होता है। दोनों पक्षों का भेद शत्रु से सामना होने पर ही ज्ञात होता है। दोनों पक्षों का सभी मामलों में समान होना संभव नहीं है।॥4॥
 
Any task undertaken with good policy and advice is completely successful without any adverse influence of fate. The difference between the two sides is known only when one confronts the enemy. It is not possible for both sides to be equal in all matters.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)