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mahabharat 2.17.3: अतः वीर पुरुषों का कर्तव्य है कि वे अपने शत्रुओं के हृदय को संतुष्ट करने के लिए नीति में बताए गए सिद्धांतों के अनुसार उन पर आक्रमण करें ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.17.3 
एतावदेव पुरुषै: कार्यं हृदयतोषणम्।
नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अतः वीर पुरुषों का कर्तव्य है कि वे अपने शत्रुओं के हृदय को संतुष्ट करने के लिए नीति में बताए गए सिद्धांतों के अनुसार उन पर आक्रमण करें ॥3॥
 
Therefore, the duty of brave men is to attack their enemies according to the principles prescribed in ethics to satisfy their hearts. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)