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mahabharat 2.17.29: महान ऋषि चण्डकौशिक ने उस अतुलनीय फल को अपने हाथ में लिया, मन ही मन उस पर मंत्र पढ़ा और पुत्र प्राप्ति हेतु राजा को दे दिया।   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.17.29 
तत् प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाभिमन्त्र्य च।
राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसम्प्राप्तिकारणम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि चण्डकौशिक ने उस अतुलनीय फल को अपने हाथ में लिया, मन ही मन उस पर मंत्र पढ़ा और पुत्र प्राप्ति हेतु राजा को दे दिया।
 
The great sage Chandakaushik took the matchless fruit in his hand, chanted mantras on it in his mind and gave it to the king to grant him a son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)