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mahabharat 2.17.27: श्रीकृष्ण कहते हैं- राजा के करुण वचन सुनकर ऋषि की इंद्रियाँ व्याकुल हो गईं (उनका हृदय पिघल गया)। तब वे ध्यानमग्न होकर उसी आम के वृक्ष की छाया में बैठे रहे।   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.17.27 
श्रीकृष्ण उवाच
एतच्छ्रुत्वा मुनिर्ध्यानमगमत् क्षुभितेन्द्रिय:।
तस्यैव चाम्रवृक्षस्यच्छायायां समुपाविशत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण कहते हैं- राजा के करुण वचन सुनकर ऋषि की इंद्रियाँ व्याकुल हो गईं (उनका हृदय पिघल गया)। तब वे ध्यानमग्न होकर उसी आम के वृक्ष की छाया में बैठे रहे।
 
Sri Krishna says- On hearing the king's pitiful words, the sage's senses were agitated (his heart melted). Then he went into meditation and remained sitting in the shade of the same mango tree.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)