श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  2.17.24-25 
तमब्रवीत् सत्यधृति: सत्यवागृषिसत्तम:।
परितुष्टोऽस्मि राजेन्द्र वरं वरय सुव्रत॥ २४॥
तत: सभार्य: प्रणतस्तमुवाच बृहद्रथ:।
पुत्रदर्शननैराश्याद् वाष्पसंदिग्धया गिरा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तब धैर्य और सत्य से युक्त चण्डकौशिक ऋषि ने राजा बृहद्रथ से कहा, ‘हे उत्तम व्रतों का पालन करने वाले राजन, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। अपनी इच्छानुसार वर माँग लो।’ यह सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों रानियों सहित ऋषि के चरणों पर गिर पड़े और रुँधे हुए स्वर में बोले, पुत्र प्राप्ति की आशा न होने के कारण उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
 
Then the sage Chandakaushik, full of patience and truth, said to King Brihadratha, 'O King, who observes the best vows, I am pleased with you. Ask for a boon as per your wish.' On hearing this, King Brihadratha, along with his two queens, fell at the sage's feet and spoke in a choked voice, shedding tears from his eyes as he was hopeless of having a son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)