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mahabharat 2.17.22-23: एक दिन उसने सुना कि गौतम वंश के महामुनि कक्षीवान के पुत्र परम दानी मुनि चण्डकौशिक अपनी तपस्या से अचानक यहाँ आकर एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं। यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (तथा नगरवासियों) के साथ उनके पास गए और उन्हें सब प्रकार के रत्न (मुनि के योग्य उत्तम वस्तुएँ) देकर संतुष्ट किया।॥22-23॥   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  2.17.22-23 
अथ काक्षीवत: पुत्रं गौतमस्य महात्मन:।
शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम्॥ २२॥
यदृच्छयाऽऽगतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम्।
पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैरतोषयत्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
एक दिन उसने सुना कि गौतम वंश के महामुनि कक्षीवान के पुत्र परम दानी मुनि चण्डकौशिक अपनी तपस्या से अचानक यहाँ आकर एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं। यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (तथा नगरवासियों) के साथ उनके पास गए और उन्हें सब प्रकार के रत्न (मुनि के योग्य उत्तम वस्तुएँ) देकर संतुष्ट किया।॥22-23॥
 
One day he heard that the extremely generous sage Chandakaushik, son of the great sage Kakshivana of Gautam lineage, had suddenly come here from his penance and was sitting under a tree. On receiving this news, king Brihadratha went to him with his two wives (and the people of the city) and satisfied him by offering all kinds of gems (excellent things befitting a sage).॥22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)