Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 2.15.5: मैं मन और इन्द्रियों के संयम को ही सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ, वही मेरे लिए कल्याणकारी होगा। राजसूय यज्ञ आरम्भ करने पर भी उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोक की प्राप्ति स्वयं के लिए असम्भव है - ऐसी मेरी मान्यता है। 5॥ | mahabharat अध्याय 2.15: जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत । mahabharat पर्व 2: सभा पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शममेव परं मन्ये शमात् क्षेमं भवेन्मम।
आरम्भे पारमेष्ठॺे तु न प्राप्यमिति मे मति:॥ ५॥
अनुवाद
मैं मन और इन्द्रियों के संयम को ही सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ, वही मेरे लिए कल्याणकारी होगा। राजसूय यज्ञ आरम्भ करने पर भी उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोक की प्राप्ति स्वयं के लिए असम्भव है - ऐसी मेरी मान्यता है। 5॥
I consider control of mind and senses to be the best, it will be beneficial for me. Even after starting Rajsuya Yagya, it is impossible for oneself to attain Brahmaloka as a result - this is my belief. 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥