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श्री महाभारत
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पर्व 2: सभा पर्व
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अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
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श्लोक 67
श्लोक
2.14.67
वयं चैव महाराज जरासंधभयात् तदा।
मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम्॥ ६७॥
अनुवाद
महाराज! उस समय मैं भी जरासन्ध के भय से पीड़ित होकर मथुरा छोड़कर द्वारकापुरी में चला गया था (और अब तक वहीं रहता हूँ)।॥67॥
Maharaj! At that time I too was afflicted by the fear of Jarasandha and left Mathura and went to Dwarkapuri (and I reside there even till now).॥ 67॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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