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mahabharat 2.14.64-65: शत्रुनाशक! राजा जरासंध ने घोर तपस्या द्वारा उमावल्लभ महात्मा महादेवजी की आराधना करके एक विशेष प्रकार की शक्ति प्राप्त की है; इसीलिए वे सभी राजा उससे पराजित हो गए हैं। वह राजाओं की बलि देकर यज्ञ करना चाहता है। हे राजनश्रेष्ठ! उसने अपनी प्रतिज्ञा लगभग पूरी कर ली है। 64-65।   |   mahabharat अध्याय 2.14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 64-65
 
 
श्लोक  2.14.64-65 
स हि राजा जरासंधो यियक्षुर्वसुधाधिपै:।
महादेवं महात्मानमुमापतिमरिंदम॥ ६४॥
आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवा:।
प्रतिज्ञायाश्च पारं स गत: पार्थिवसत्तम॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
शत्रुनाशक! राजा जरासंध ने घोर तपस्या द्वारा उमावल्लभ महात्मा महादेवजी की आराधना करके एक विशेष प्रकार की शक्ति प्राप्त की है; इसीलिए वे सभी राजा उससे पराजित हो गए हैं। वह राजाओं की बलि देकर यज्ञ करना चाहता है। हे राजनश्रेष्ठ! उसने अपनी प्रतिज्ञा लगभग पूरी कर ली है। 64-65।
 
Enemy-destroyer! King Jarasandha has attained a special kind of power by worshipping Umavallabh Mahatma Mahadevji through intense penance; that is why all those kings have been defeated by him. He wants to perform a yajna by sacrificing the kings. O best of kings! He has almost fulfilled his promise. 64-65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)