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श्री महाभारत
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पर्व 2: सभा पर्व
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अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
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श्लोक 61
श्लोक
2.14.61
स त्वं सम्राड्गुणैर्युक्त: सदा भरतसत्तम।
क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत॥ ६१॥
अनुवाद
भरतवंशशिरोमाणे! आपमें सदैव सम्राट के गुण विद्यमान हैं। अतः भारत! आपको क्षत्रिय समाज में सम्राट बनना चाहिए। 61॥
Bharatvanshshiromane! You always possess the qualities of an emperor. So India! You should make yourself an emperor in the Kshatriya community. 61॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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