श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  2.14.54-55 
त्रियोजनायतं सद्म त्रिस्कन्धं योजनावधि॥ ५४॥
योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम्।
अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदै:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
रैवत दुर्ग की लंबाई तीन योजन है। प्रत्येक योजन पर सैनिकों के तीन समूहों का शिविर है। प्रत्येक योजन के अंत में सौ द्वार हैं, जो सेनाओं द्वारा सुरक्षित हैं। योद्धाओं का पराक्रम ही उस दुर्ग का मुख्य द्वार है। उस दुर्ग की रक्षा अठारह यादववंशी क्षत्रिय करते हैं, जो युद्ध में उन्मत्त होकर अपना पराक्रम दिखाते हैं।
 
The length of the fort of Raivat is three yojanas. There is a camp of three groups of soldiers on every yojana. There are hundred gates at the end of every yojana, which are protected by the armies. The valour of the warriors is the main gate of that fort. That fort is protected by eighteen Yadava clan Kshatriyas who go mad in war and show their valour.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)