श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.14.50 
कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम्।
ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
और राजन! हम लोग रैवतक पर्वत से सुशोभित सुन्दर कुशस्थली पुरी में रहने लगे॥50॥
 
And Rajan! We started living in Puri, a beautiful Kushasthali, adorned with the mountain Raivatak. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)