श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  2.14.48-49 
पृथक्त्वेन महाराज संक्षिप्य महतीं श्रियम्॥ ४८॥
पलायामो भयात् तस्य ससुतज्ञातिबान्धवा:।
इति संचिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिता:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस समय हमने यह निश्चय किया कि ‘यहाँ की विशाल सम्पत्ति को हम लोग अनेक व्यक्तियों में बाँट लें और शत्रु के भय से अपने पुत्रों तथा भाइयों सहित थोड़ा-थोड़ा करके भाग जाएँ।’ ऐसा विचार करके हम सबने पश्चिम दिशा में शरण ली।
 
King! At that time we decided that 'we should divide the vast wealth here into several individuals and run away little by little with our sons and brothers out of fear of the enemy.' Thinking so, we all took refuge in the west. 48-49.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)