श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  2.14.16-17 
प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्या: प्रति यो नृप:॥ १६॥
मातुलो भवत: शूर: पुरुजित् कुन्तिवर्धन:।
स ते सन्नतिमानेक: स्नेहत: शत्रुसूदन:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पश्चिम से दक्षिण तक भारतवर्ष के भाग पर राज्य करने वाले आपके मामा, शत्रुसंहारक योद्धा, कुन्तिभोज कुल को आगे बढ़ाने वाले पुरुष ही स्नेहवश आपके प्रति प्रेम और आदर का भाव रखते हैं ॥16-17॥
 
Your maternal uncle, who rules over the part of India from the west to the south, that enemy-killing warrior, Kuntibhoja clan-advancing man, alone has a feeling of love and respect for you out of affection. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)