श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 14: श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति  »  श्लोक 14-16h
 
 
श्लोक  2.14.14-16h 
मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिप:।
अपर्यन्तबलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा॥ १४॥
भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितु: सखा।
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषत:॥ १५॥
स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद् भक्तिमांस्त्वयि।
 
 
अनुवाद
महाराज! जो मुर और नरक नामक देशों का शासन करते हैं, जिनकी सेना अनन्त है, जो वरुण के समान पश्चिम के अधिपति कहलाते हैं, जो वृद्ध हो चुके हैं और जो आपके पिता के मित्र रहे हैं, वे यवनराज राजा भगदत्त भी वचन और कर्म से जरासंध को प्रणाम करते हैं; तथा आपके प्रति उनके मन में प्रेम है और जैसे पिता अपने पुत्र से प्रेम करता है, वैसे ही वह आपके प्रति स्नेह रखते हैं॥14-15 1/2॥
 
Maharaj! The one who rules the countries named Mura and Naraka, whose army is endless, who is called the ruler of the west like Varuna, who has grown old and who has been your father's friend, that king Bhagadatta, the ruler of Yavana, also bows down before Jarasandha in words and actions; and he is bound in his mind by the love for you and just like a father loves his son, he has the same affection for you.॥ 14-15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)