श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक d3h-42h
 
 
श्लोक  2.13.d3h-42h 
वैशम्पायन उवाच
इन्द्रसेनवच: श्रुत्वा यादवप्रवरो बली।)
दर्शनाकाङ्क्षिणं पार्थं दर्शनाकाङ्क्षयाच्युत:॥ ४१॥
इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात् तदा।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - दूत इन्द्रसेन के ये वचन सुनकर यदुवंश के महारथी भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर के दर्शन की इच्छा से दूत इन्द्रसेन के साथ इन्द्रप्रस्थ नगरी में आये।
 
Vaishampayanji says - Hearing these words of messenger Indrasen, Lord Shri Krishna, the great warrior of Yadu dynasty, himself came to Indraprastha city along with messenger Indrasen to see Yudhishthir, desirous of seeing him. 41 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)