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mahabharat 2.13.5: राजेन्द्र! उस समय कौरवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने बार-बार विचार करके केवल राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान पर ही ध्यान लगाया॥5॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.13.5 
स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मन: संचिन्त्य चासकृत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उस समय कौरवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने बार-बार विचार करके केवल राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान पर ही ध्यान लगाया॥5॥
 
Rajendra! At that time, Yudhishthira, the best of Kurus, after thinking again and again, concentrated only on the ritual of Rajasuya Yagya. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)