vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना
»
श्लोक 5
श्लोक
2.13.5
स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मन: संचिन्त्य चासकृत्॥ ५॥
अनुवाद
राजेन्द्र! उस समय कौरवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने बार-बार विचार करके केवल राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान पर ही ध्यान लगाया॥5॥
Rajendra! At that time, Yudhishthira, the best of Kurus, after thinking again and again, concentrated only on the ritual of Rajasuya Yagya. 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×