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mahabharat 2.13.47: जिसमें सब कुछ संभव है अर्थात् जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है और जो सबका स्वामी है, वही राजा राजसूय यज्ञ कर सकता है ॥47॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.13.47 
यस्मिन् सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते।
यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जिसमें सब कुछ संभव है अर्थात् जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है और जो सबका स्वामी है, वही राजा राजसूय यज्ञ कर सकता है ॥47॥
 
The one in whom everything is possible i.e. who can do everything, who is worshipped everywhere and who is the Lord of all, only that king can perform the Rajasuya Yagya. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)