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mahabharat 2.13.44: तत्पश्चात् वे अपने प्रिय मित्र अर्जुन से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए, फिर नकुल और सहदेव ने गुरु के समान उनकी सेवा और पूजा की ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.13.44 
प्रीत: प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा।
अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत् पर्युपासित:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे अपने प्रिय मित्र अर्जुन से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए, फिर नकुल और सहदेव ने गुरु के समान उनकी सेवा और पूजा की ॥44॥
 
Thereafter, he became very happy after meeting his beloved friend Arjuna. Then Nakul and Sahadev served and worshiped him like a guru. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)