श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.13.4 
युधिष्ठिरस्तत: सर्वानर्चयित्वा सभासद:।
प्रत्यर्चितश्च तै: सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् युधिष्ठिर ने अपने दरबार के सब लोगों का स्वागत किया और सब लोगों ने भी उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। अन्त में (सबकी सहमति से) उनका मन यज्ञ करने के निश्चय पर दृढ़ हो गया॥4॥
 
Thereafter Yudhishthira welcomed all the members of his court and all the members also honoured him with great respect. In the end (with everyone's consent) his mind became firm on the resolution of performing the yajna.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)