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mahabharat 2.13.39-41h: उनके लिए कुछ भी असह्य नहीं है। इस प्रकार वे उसे सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ मानते थे। ऐसा निश्चय करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने गुरुजनों के निवेदन से तत्काल ही समस्त प्राणियों के गुरु श्रीकृष्ण के पास एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्र ही तीव्र गति से चलने वाले रथ पर सवार होकर यादवों के यहाँ पहुँचा और द्वारका में ही द्वारकावासी श्रीकृष्ण से मिला। 39-40 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 39-41h
 
 
श्लोक  2.13.39-41h 
न स किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत।
स तु तां नैष्ठिकीं बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिर:॥ ३९॥
गुरुवद् भूतगुरवे प्राहिणोद् दूतमञ्जसा।
शीघ्रगेन रथेनाशु स दूत: प्राप्य यादवान्॥ ४०॥
द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत्।
 
 
अनुवाद
उनके लिए कुछ भी असह्य नहीं है। इस प्रकार वे उसे सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ मानते थे। ऐसा निश्चय करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने गुरुजनों के निवेदन से तत्काल ही समस्त प्राणियों के गुरु श्रीकृष्ण के पास एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्र ही तीव्र गति से चलने वाले रथ पर सवार होकर यादवों के यहाँ पहुँचा और द्वारका में ही द्वारकावासी श्रीकृष्ण से मिला। 39-40 1/2॥
 
Nothing is unbearable for them. In this way they considered him omnipotent and omniscient. Having such a determined mind, Kuntinandan Yudhishthir immediately sent a messenger to Shri Krishna, the Guru of all living beings, as a request to the teachers. That messenger immediately reached the Yadavas' place in a fast-moving chariot and met Shri Krishna, a resident of Dwarka, in Dwarka itself. 39-40 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)