श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  2.13.32-33h 
अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम्।
अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिर्ऋषिभिस्तथा॥ ३२॥
मन्त्रिणो भ्रातरश्चान्ये तद्वच: प्रत्यपूजयन्।
 
 
अनुवाद
"हे धर्म के ज्ञाता! आप राजसूय यज्ञ करने के पूर्णतः योग्य हैं।" जब पुरोहितों और ऋषियों ने राजा युधिष्ठिर से यह बात कही, तब उनके मन्त्रियों और भाइयों ने उन महात्माओं के वचनों का बड़ा आदर किया।
 
"O knower of Dharma! You are fully qualified to perform the Rajasuya Yagya." When the priests and sages said this to King Yudhishthira, then his ministers and brothers greatly respected the words of those great souls. 32 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)