श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.13.30 
युधिष्ठिर उवाच
इयं या राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतो:।
श्रद्दधानस्य वदत: स्पृहा मे सा कथं भवेत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे महात्माओं! राजसूय नामक महान यज्ञ तो सम्राट के लिए ही योग्य है, फिर भी मैं उसका आदर करने लगा हूँ; अतः आप लोग कृपा करके मुझे बताइये कि मेरे मन में राजसूय यज्ञ करने की जो इच्छा उत्पन्न हुई है, उसका क्या कारण है?"
 
Yudhishthira said, "O great souls! The great sacrifice called Rajasuya is fit only for an emperor, yet I have started respecting it; therefore, you all please tell me, what is the reason for this desire of performing the Rajasuya sacrifice that has arisen in my mind?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)