श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.13.26 
अविचार्य महाराज राजसूये मन: कुरु।
इत्येवं सुहृद: सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अतः तुम बिना किसी विचार के राजसूय अनुष्ठान में मन लगाओ। इस प्रकार उसके सभी मित्रों ने अलग-अलग तथा सामूहिक रूप से अपना-अपना मत प्रकट किया॥ 26॥
 
"Therefore, without any thought, concentrate on the Rajasuya ritual." Thus all his friends, both separately and collectively, expressed their opinion.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)