श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.13.18 
यस्मिन्नधिकृत: सम्राड् भ्राजमानो महायशा:।
यत्र राजन् दश दिश: पितृतो मातृतस्तथा।
अनुरक्ता: प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! दसों दिशाओं में दृष्टिगोचर होने वाले वे तेजस्वी सम्राट जहाँ कहीं राज्य करते, वहाँ ग्वालों से लेकर ब्राह्मणों तक की सारी प्रजा उन्हें माता-पिता के समान प्रेम करती।॥18॥
 
O King! Wherever that glorious Emperor, who was visible in all the ten directions, would rule, all the subjects, from cowherds to Brahmins, would love him like their father and mother.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)