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mahabharat 2.13.17: राजा युधिष्ठिर की कीर्ति सर्वत्र फैल रही थी। समस्त गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत-ग्रीष्म आदि समस्त क्लेशों को सहन करने में समर्थ थे और अपने राजसी गुणों से सर्वत्र सुशोभित थे। 17॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.13.17 
सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाह: स सर्वराट्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
राजा युधिष्ठिर की कीर्ति सर्वत्र फैल रही थी। समस्त गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत-ग्रीष्म आदि समस्त क्लेशों को सहन करने में समर्थ थे और अपने राजसी गुणों से सर्वत्र सुशोभित थे। 17॥
 
The fame of King Yudhishthir was spreading everywhere. All the virtues were enhancing his beauty. He was capable of tolerating all the conflicts like cold and heat and was adorned everywhere with his royal qualities. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)