श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.13.1 
वैशम्पायन उवाच
ऋषेस्तद् वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिर:।
चिन्तयन् राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! नारद मुनि के वचन सुनकर युधिष्ठिर ने गहरी साँस ली। राजसूय यज्ञ के विषय में सोचते हुए उन्हें शांति नहीं मिल रही थी।
 
Vaishmpayana says- Janamejaya! Yudhishthira took a deep breath after hearing the words of sage Narada. He could not find peace while thinking about the Rajasuya Yagna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)