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श्लोक 2.1.5  |
मय उवाच
युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ।
प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| मयासुर ने कहा - प्रभु ! पुरुषोत्तम ! आपने जो कहा है, वह आप जैसे महापुरुष के अनुकूल है; परंतु भरत ! मैं बड़े प्रेम से आपके लिए कुछ करना चाहता हूँ ॥5॥ |
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| Mayasura said - Lord! Purushottam! What you have said is in accordance with a great man like you; but Bharat! I want to do something for you with great love. ॥ 5॥ |
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